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LEHREN

लहरें हाथ में ना आएंगे और ले साथ में ना जाएंगे मन समंदर ये है ठहरा सा है गहरा क्यों किनारे का बेचैन है चेहरा आते हैं यूँ मचलके उमड़ते हुए उछलके रेत के प्योलों में खेले ख्यालों डर है कि मिल ना पाए डर भी है मिल ना जाए ये कैसा नाता? कभी खटकता भाता लहरें हाथ में ना आएंगे और ले साथ में ना जाएंगे लहरें ठहरें ना आएंगे ये जाएंगे लख लख पास में पर ना रख पाएंगे आ गले लगते इक पल अगले ही पल में ओझल देते हैं कष्ट इक पल नष्ट इक पल लहरें हाथ में ना आएंगे और ले साथ में ना जाएंगे *** में भागूँ लहरों के पीछे ठहरो मुझे ले चलो संग? में रुक गया हूं मैं थक गया हूँ ना जीतना है जंग लहरों की क्यों मैं इस चक्रव्यूह में धंसता जा रहा ये रस्ता जाना रिस्ता निभाना तो बस का ना रहा छोड़ो ये तमाशा बेकार सी ये आशा समझूंगा ना मनसा ना लहरों की भाषा टूट के लेट के रेत पे स्वीकारता जंग ना संग ना, तरंग का इंतेज़ार ना फेन-दंत ओढ़े ठहाके वो छोड़े धारा के घोड़े पे बेलगाम दौड़े पैरों पे फेन-चुम्बन खिंचे रेत-चुंबक करके पूरा कर देता अधूरा ना वश में है करना ना तिजोरी में भरना बस होने देना हो के खोने द...